Tuesday, October 19, 2010

डर



मंजिले उन्ही के कदम चूमती है जिनके होसलो में कभी डर का साया छिपा रहता है |
डर ही तो होता है जो बेखाय्ली में होसले की बुनियाद देता है ||

हाथो की लकीरें



हाथो की लकीरें हो जैसे - यह रास्ते क्यों होते है टेड़े मेड़े, कटते है काटते है,
मिलते है अपना रुख भी बदलते है - मिलाते भी है और दूर भी यही ले जाते है,
उलझनों में फसा तेरा कौन यह भी बतलाते है - पर सोचना यह है की रास्ते लकीरों से बनते है यह लकीरों से रास्ते |

Tuesday, July 27, 2010

Past or Present

When I was a child I heard many a times that the most beautiful season of life is our “Present” and the most miserable one is our “Future”. I am eager to know why our seasons don’t changes so frequently. I am aware that change is not permanent but still without getting destroyed I want to live again my “Past”.

Friday, July 9, 2010

एहसास

(14 - जून - 2010) आज फिर बहुत अकेला हूँ, महसूस कर रहा हूँ यादो के उस बिछोने को जिसमे लपेट फिर एक बार मेरा खुदा लखनऊ के लिए रवाना हो गया, बात कर रहा हूँ जन्म देने वाले उस खुदा की जिसे दुनिया माँ - बाप के नाम से जानती है | ट्रेन चल पढ़ी है और लिए जा रही है उन्हें मुझसे दूर एक और बार, 3 साल का समय बड़ा अजीब साबित हो रहा है - मिलने बिछअड़ने की लुक्का छूपी में समय और जस्बात दोनों ही मेरे साथ खेलने में लगे हुए है, पर पता नहीं कब ठहराव के बादल आयेंगे और सब कुछ फिर स्थिर होगा |

25 दिनों का सफ़र उनके साथ मेरी ज़िन्दगी के सबसे हसीन पालो में से एक, जिन्हें में शायद कभी शब्दों में बयान नहीं कर सकता, बस कर रहा हूँ तो एक नाकाम कोशिश इस जस्बात को संजोने की या यह कहेना जय्दा सटीक रहेगा पिरोने की, जैसे मोती-मोती पिरोने से बनती है माला, में भी पिरोने चला हूँ अपने एह्सासो की गाथा |

आँखे भरी और डबडबाई हुई लड़ रही दोनों एक दुसरे से, शायद धयान कही और करने की कोशिश में लगी हुई थी दोनों, जानती जो थी न करेंगी ऐसा तो छलक पड़ेंगी और दे जाएँगी इन यादो के पन्नो पे सिहाई का दाग, क्यों कि लिखा जाता है सफ़र ज़िन्दगी का जिस सिहाई से, कच्ची होती है बहुत पर यकीन जानिए इनका असर होता है बहुत गहरा जो बना जाता है रिश्तो को और पक्का |

खयालो से लड़ना काफी कठिन होता है और वापस अकेले होने का ख्याल काफी डरावना, वैसे वो उपरी तोर से तो कम पर अन्दर से पूरा खोखला कर जाता है और बदल जाता है एक इंसान को मुर्दा की शकल में, पर में अकेला नहीं हूँ वो हमेशा मेरे साथ है, उनका प्यार भरा हाथ हमेशा मेरे ऊपर है, बस कुछ ही दिन की तो बात है, में दिवाली पे घर जा रहा हूँ इसी खुशनुमा एहसास के साथ में आज फिर एक नयी सास ले के जी रहा हूँ |

Friday, June 11, 2010

बचपन और जवानी

बचपन एक हसीन खवाब जिसमे हम जितने भी गोते लगाये एक न एक दिन निकल कर हमको जवानी की दलदल में पैर रखना ही होगा और लड़ना होगा सब से यक़ीनन सब से इस देश से भी, ज़रा गौर से सोचिये अगर हम लड़ रहे है इस देश की कानून व्वस्था से, या अगर हम लड़ रहे है देश की गरीबी से, यह बाकि सब से तो आखिर ज़ाहिर यही हो रहा है की हम लड़ रहे है देश से, क्यों कि पल रहा है ये सब इसकी गोद में और जन्म दे रहा है सिर्फ और सिर्फ शोषण और भ्रष्टाचार को...!

खैर जाने दीजिये हम वापस बात करते है बचपन की -- जब हम किशोर थे पर हमारी आशाए हमारी सोच सब ज़वा थी, जहाँ सब कुछ मिलता था बिना किसी घुटन के बिना तकलीफ के एक खुशनुमा एहसास के साथ, मुड के देखने को करता है दिल फिर वही बचपन, दामन में खुशिया लपटे जीने को करता है दिल फिर एक बार या कहूँ बार-बार, जहाँ शामे रंगीन हुआ करती थी और रातें नये खवाब बुनती थी, रोज़ सुबह लती थी नये एहसास जहाँ होती थी सकेड़ो नयी बात| हाँ वही बचपन जहाँ दुसरों को खुश देख भी होती थी अनकही ख़ुशी, पर आज बदल चूका है सब एक घिनोने विचार और एक डरा देने वाले ख्वाब सा|

कभी - कभी  लगता है सब एक सपना था, अब जब जवानी में हूँ और चल रहा है एक नया दौर ज़िन्दगी का, सब बदला - बदला लगता है ये शोर ज़िन्दगी का, यहाँ कोई खुश नहीं होता दुसरों की ख़ुशी से क्यों कि सब लगे है गला काट दुसरों का और अपनी जेब भरने में, कुछ हासिल नहीं होता यहाँ बिना तकलीफ के और हो भी जाये तो नहीं महसूस होती है खुशी क्यों कि जुड़ा है स्वार्थ सभी से|

कई बातें है जो समझ में नहीं आती या यु कहे की समझ के समझी नहीं जाती, हर किसी का ईमान हो गया है सस्ता जो बिक सकता है क्यों कि उसका पयमाना है अब हल्का,  सही काम करने वाले होते जा रहे है कम और लोगो को अगर दिख जाये तो उन्हें होने लगती है उलझन, जज्बातों का मतलब हो चुका है खत्म, सब लगे हुए है खेलने में एक नया चलन, आबाद और बरबाद यह दो शब्द लिए जी रहा है इंसान, इसके अलावा अब उसको नहीं है दूसरा काम|

पडोसी पहेले चकले की आवाज़ से पता कर लेते थे की कितनी बनी है रोटी, आज उन्हें यह भी नहीं पता की कब टूटी तिजोरी, स्वार्थ ने ले ली है जगह दिलो में, इंसान हो गया है हैवान चुटकियो में, जवानी के इस परिवर्तन में सबको है बदल ढाला कैसे कहे ये सब किसकी माया, नोट और वोट इनका है बोल बाला, बाकि सब चीजों को हमने शायद कही जला ढाला|

शर्म आनी चाहिए हम इंसानों को, कभी तो पलट के देख लेना चाहिए वापस बचपन में, यकीं से तो नहीं कह सकता पर कुछ तो असर होना ही चाहिए, अगर है इंसान तो दिल तो पस्सिसना चाहिए|

बाकि बातो के लिए शायद में अभी भी बच्चा हूँ, इतना ही सच लिख सका हूँ क्यों की सच्चा हूँ |

Monday, June 7, 2010

जज़्बात



जज़्बात सजोने से जो रिश्ते बनते है -- मुश्किल से ये दिल कही और मिलते है |
अनजाने में भी न खेलना इन दिलो से -- ये जो खो जाये तो बाकि सभी गैर निकलते है ||

Friday, April 23, 2010

फ़न्हा



न समझ पाओगे यह सोचा न था -- यु बेखबर हो जाओगे यह सोचा न था |
होकर तेरे समा तुझमे जायेंगे यह सोचा न था -- मिटना तो था पर फ़न्हा तुझमे हो जायेंगे यह सोचा न था ||

Thursday, April 22, 2010

रिश्ते



हर रिश्ते कि उम्र होती है -- ज़िन्दगी कि डौर बांधे रखना भी एक जंग होती है |
जान जाती है दोनों के टूटने के बाद और ज़िन्दगी बेरंग होती है ||

रूह



मेरी रूह में तेरी सांसो की कमी बहुत है -- वह कह रहे है अब चले इतनी मुलाकात बहुत है |
मैने कहा रुक जाओ अभी रात बहुत है -- प्यार मेरा थम जाये जो कभी तो फिर शोक से चले जाना |
ऐसे में कहा जाओगे की आने वाली बरसात बहुत है -- साथ रहेना हमेशा कहेना की उम्र रिश्ते की हुई बहुत है ||

Tuesday, March 9, 2010

पतवार



में वो नदी हूँ जिसका कोई किनारा नहीं है
पार तो जाना है पर पतवार का ठिकाना नहीं है
डूब जाऊंगा यह पार चला जाऊंगा -- इस जीवन के दिए में अब लौ का सहारा नहीं है!!

तस्वीरे



मुलाकात भी आंसु दे जाती है -- दिल में अजीब सा दर्द दे जाती है!
गुज़ारे हुए लम्हे जब याद आते है -- तस्वीरे हुबहू सामने खड़ी हो जाया करती है!!

मौसम-ऐ-हालात



मौसम कि तरह हालात बदलते है -- जैसे दिलो में जस्बात बदलते है!
आज देख हमे जो रास्ते बदलते है -- गम नहीं क्यों कि सारे रास्ते हमारी और ही मुढ़ते है!!

Monday, February 15, 2010

फितरत


वफ़ा करके भी बेवफा का नाम पाया है
मोहबत करके हमने बस यही एक तोहफा एहसान पाया है
रहेने दे कुछ और न कह ऐ ज़ालिम
इल्म है सभी को -- कोई कहा अपनी फितरत छिपा पाया है

तासीर


खवाबो कि तासीर बड़ी शक्थ होती है
कभी ख़ुशी तो कभी गम देती है
दोनों पहलु से रूबरू है नायाब आँखे
सो कभी हँसती और कभी रोती है आँखे॥

Thursday, February 4, 2010

खुदा का दीदार


तुझमे खुदा का दीदार करता रहा -- तुझे पूजता और तेरे लिए ही दुआ करता रहा
मालूम न था नाराज़ हो जायेगा वह एक दिन -- मैने तो सोचा था वह तुझमे ही बस्ता है॥

Wednesday, February 3, 2010

महफ़िल


कल खुद ही महफ़िल से निकाला था हमे -- आज मेरे जैसा दीवाना खोजते है
मिले न मिले उन्हें हमसा कोई -- पर मेरे दिल के हर एक कोने में वही बसते है ॥

दीदार


आखिरी
बार मिल लेना उस बद-नसीब से -- जो तड़प रहा है अरसे से तेरे दीदार को
ज़ख्म गहरा जो दिया था तुने उसे -- पाक करता है उन्हें हर रात चीर के अंधकार को॥

Friday, January 29, 2010

शक


चाहने से पहले वफ़ा पे शक है
जीने से पहले जिंदा होने पे शक है
मुलाकात से पहले मिलन-ऐ-तारीख पे शक है
इतना शक न कर ऐ ज़ालिम की तुझे हर सच पे शक है ॥

Wednesday, January 27, 2010

तलाश


में खुद ही अपनी तलाश में हूँ - मेरा कोई रहनुमा नहीं है
वो क्या दिखायेंगे हमे रास्ता जिन्हें खुद अपना पता नहीं है
बहुत दिनों से देख रहा हूँ मिल रही है सजा हर खता की
पर पहेले कोई यह तो बता दे - कौन सी सजा कौन सी खता की है

Friday, January 22, 2010

दास्ताँ

मुझे भी अपनी दास्ताँ कहने दो
आंसु कह रहे है दिल की बात कहेने दो
बड़े बेवफा निकले तुम - ये बात सिर्फ आपने तक रहेने दो
तुम हो गए किसी और के - कम से कम हमे तो अपनी खातिर जीने दो !!

मुद्दत

फिर शाम ढली - तुम आये आज भी
मतलब दिल को फिर बहलाना होगा
वादा खिलाफी कर गए फिर आप
देखना दिन कयामत तक पछताना होगा
लहू से नाम लिखा होगा कफ़न पे
जब
थाम के हाथ में फूल आना तुमको होगा
देख
मुद्दत तक किया इंतज़ार तेरा
उम्र
कट गयी अब तो जाना होगा ...!!!

Wednesday, January 20, 2010

दामन


आंसुओ से भर गया दामन मेरा
फ़र्क नहीं आबाद हुआ रोशन तेरा
में तो हवा के
मानिन्द था ठहेरा
आज कैद तो कल रिहा हो बेठा !!!

पत्थर के भिछोने


वह
सक्श जो तनहा रोता है
अपने आंसुओ को पलकों से पिरोता है
सो जो नहीं पा रहा है पत्थर के भिछोने पे
यक़ीनन किसी की बाहों में सोता रहा होगा !!

रात


आज की रात बड़ी शोख और कातिल है
आज तो फिर मुश्किल है नींद का आँखों में आना
रोज़ सोचता हूँ में यही -- पर चलता तो रहता है ज़िन्दगी का आना जाना !!

आखिरी सलाम


आज की रात तुझे आखिरी सलाम और दे दू
कौन
जाने कल यह ज़िन्दगी का दिया जले या जले
झूठ
और फरेब की इस मतलबी दुनिया में
कल
फिर सच की हवा चले या चले !!

Tuesday, January 19, 2010

दोस्ती ऐ ज़िन्दगी

दोस्ती का यही तकाजा है ! अपना लज़ाम मेरे सर डालो
सोच बाद में भी लेना ! पहले हालात पर नज़र डालो
ज़िन्दगी जब बहुत छोटी लगे मेरे दोस्त
कहा मनो -- एक छोटा सा गुनाह कर ढालो!!

निगाहे

मेरी निगाहे क्यों दूंढ़ती है उसे
जिस शोख का मैने कभी जलवा नहीं देखा
देखा है रोते और तड़फते हुए दिल को
जिस रोज़ हमने एक नज़र वोह चेहरा नहीं देखा !!