Monday, February 15, 2010

फितरत


वफ़ा करके भी बेवफा का नाम पाया है
मोहबत करके हमने बस यही एक तोहफा एहसान पाया है
रहेने दे कुछ और न कह ऐ ज़ालिम
इल्म है सभी को -- कोई कहा अपनी फितरत छिपा पाया है

तासीर


खवाबो कि तासीर बड़ी शक्थ होती है
कभी ख़ुशी तो कभी गम देती है
दोनों पहलु से रूबरू है नायाब आँखे
सो कभी हँसती और कभी रोती है आँखे॥

Thursday, February 4, 2010

खुदा का दीदार


तुझमे खुदा का दीदार करता रहा -- तुझे पूजता और तेरे लिए ही दुआ करता रहा
मालूम न था नाराज़ हो जायेगा वह एक दिन -- मैने तो सोचा था वह तुझमे ही बस्ता है॥

Wednesday, February 3, 2010

महफ़िल


कल खुद ही महफ़िल से निकाला था हमे -- आज मेरे जैसा दीवाना खोजते है
मिले न मिले उन्हें हमसा कोई -- पर मेरे दिल के हर एक कोने में वही बसते है ॥

दीदार


आखिरी
बार मिल लेना उस बद-नसीब से -- जो तड़प रहा है अरसे से तेरे दीदार को
ज़ख्म गहरा जो दिया था तुने उसे -- पाक करता है उन्हें हर रात चीर के अंधकार को॥