Friday, June 11, 2010

बचपन और जवानी

बचपन एक हसीन खवाब जिसमे हम जितने भी गोते लगाये एक न एक दिन निकल कर हमको जवानी की दलदल में पैर रखना ही होगा और लड़ना होगा सब से यक़ीनन सब से इस देश से भी, ज़रा गौर से सोचिये अगर हम लड़ रहे है इस देश की कानून व्वस्था से, या अगर हम लड़ रहे है देश की गरीबी से, यह बाकि सब से तो आखिर ज़ाहिर यही हो रहा है की हम लड़ रहे है देश से, क्यों कि पल रहा है ये सब इसकी गोद में और जन्म दे रहा है सिर्फ और सिर्फ शोषण और भ्रष्टाचार को...!

खैर जाने दीजिये हम वापस बात करते है बचपन की -- जब हम किशोर थे पर हमारी आशाए हमारी सोच सब ज़वा थी, जहाँ सब कुछ मिलता था बिना किसी घुटन के बिना तकलीफ के एक खुशनुमा एहसास के साथ, मुड के देखने को करता है दिल फिर वही बचपन, दामन में खुशिया लपटे जीने को करता है दिल फिर एक बार या कहूँ बार-बार, जहाँ शामे रंगीन हुआ करती थी और रातें नये खवाब बुनती थी, रोज़ सुबह लती थी नये एहसास जहाँ होती थी सकेड़ो नयी बात| हाँ वही बचपन जहाँ दुसरों को खुश देख भी होती थी अनकही ख़ुशी, पर आज बदल चूका है सब एक घिनोने विचार और एक डरा देने वाले ख्वाब सा|

कभी - कभी  लगता है सब एक सपना था, अब जब जवानी में हूँ और चल रहा है एक नया दौर ज़िन्दगी का, सब बदला - बदला लगता है ये शोर ज़िन्दगी का, यहाँ कोई खुश नहीं होता दुसरों की ख़ुशी से क्यों कि सब लगे है गला काट दुसरों का और अपनी जेब भरने में, कुछ हासिल नहीं होता यहाँ बिना तकलीफ के और हो भी जाये तो नहीं महसूस होती है खुशी क्यों कि जुड़ा है स्वार्थ सभी से|

कई बातें है जो समझ में नहीं आती या यु कहे की समझ के समझी नहीं जाती, हर किसी का ईमान हो गया है सस्ता जो बिक सकता है क्यों कि उसका पयमाना है अब हल्का,  सही काम करने वाले होते जा रहे है कम और लोगो को अगर दिख जाये तो उन्हें होने लगती है उलझन, जज्बातों का मतलब हो चुका है खत्म, सब लगे हुए है खेलने में एक नया चलन, आबाद और बरबाद यह दो शब्द लिए जी रहा है इंसान, इसके अलावा अब उसको नहीं है दूसरा काम|

पडोसी पहेले चकले की आवाज़ से पता कर लेते थे की कितनी बनी है रोटी, आज उन्हें यह भी नहीं पता की कब टूटी तिजोरी, स्वार्थ ने ले ली है जगह दिलो में, इंसान हो गया है हैवान चुटकियो में, जवानी के इस परिवर्तन में सबको है बदल ढाला कैसे कहे ये सब किसकी माया, नोट और वोट इनका है बोल बाला, बाकि सब चीजों को हमने शायद कही जला ढाला|

शर्म आनी चाहिए हम इंसानों को, कभी तो पलट के देख लेना चाहिए वापस बचपन में, यकीं से तो नहीं कह सकता पर कुछ तो असर होना ही चाहिए, अगर है इंसान तो दिल तो पस्सिसना चाहिए|

बाकि बातो के लिए शायद में अभी भी बच्चा हूँ, इतना ही सच लिख सका हूँ क्यों की सच्चा हूँ |

2 comments:

  1. Its good. Keep on writing.

    ReplyDelete
  2. tumhe itna khoobsurat likhta dekh kar bahut accha lag raha hai...zindagi ko bahut qareeb se dekh rahe ho..samajh rahe ho ..aur use jee rahe ho...khayal nek hai aur dil tumhara accha hai...bhagwan kare zindagi me tumhe wo sabhi khudhiya haasil ho jinki tumne chahat ki hai...ye ek dost ki dua hai

    ReplyDelete